वाराणसी। आयुर्वेदीय,नेचुरल (प्राकृतिक),हर्बल सौन्दर्य प्रसाधनों के अलंकरण से आज भारतीय शहरी ,कस्बाई एवं ग्रामीण बाजार पट गये हैं। इस नव अवधारित बाजार की वृद्धि दर 16 फीसदी से अधिक अनुमानित है। इसका लाभ उठाने के लिए पतंजली,श्री तत्व,हिंदुस्तान यूनिलीवर,डाबर, वैद्यनाथ एवं हिमालय आदि आदि खिलाडी बाजार में आयुर्वेदीय /नेचुरल ( प्राकृतिक ) /हर्बल सौन्दर्य प्रसाधनों यथा साबुन ,सैम्पू ,बालो के तेल ,दंतमंजन एवं अनेक फेस क्रीम के साथ अपने अपने लुभावनो विज्ञापनों की रणनीति के साथ जनता जनार्दन की तथाकथित सेवा में उपलब्ध हैं। लाख टके का सवाल यह है कि विभिन्न औद्योगिक घरानों के ये उत्पाद कितने सही हैं। बाजार में आने और अपने दावो की सत्यता प्रमाणित करने के लिए इन्होने क्या कोई नियमानुसार वैज्ञानिक परीक्षण किये हैं? क्या किसी लाइसेंस प्रदाता सरकारी संघठन से इन्होने कोई निर्माण अनुज्ञा प्राप्त की है? उपभोक्ता इन हर्बल और नेचुरल के कम्पोजीशन को ध्यान से देखे तो पता चलता है की 100 में से मात्र 2 या 3 प्रतिशत घटक ही नेचुरल है और इन्हे सिर्फ ब्रांडिंग कर बेचा जा रहा है। क्रीम के बेस एवं अन्य घटक केमिकल है किन्तु इन्हे नेचुरल की ब्रांडिंग कर दी जा रही है।

सरकारी नियमों का लाभ उठाकर उपभोक्ताओं को चपत

इन उत्पादों की निर्माता कंपनियां भारत सरकार के आयुष मन्त्रालय, सीडीएससीओ (केन्द्रीय मानक नियंत्रण संगठन दवाओं) एवं भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण ,स्वास्थ्य मन्त्रालय भारत सरकार के नियमो के अंतरविरोधो का लाभ उठा कर सामान्यजनो का भावनात्मक एवं आर्थिक शोषण कर रही हैं। इस स्थिति को देखते हुए बीएचयू के चिकित्सा विज्ञानं संस्थान के आयुर्वेद संकाय के रस शास्त्र एवं भैषज्य कल्पना विभाग के प्रोफेसर आनन्द चौधरी ने सचिव आयुष मन्त्रालय भारत सरकार को पत्र लिखकर यह मांग की है आयुर्वेदीय,नेचुरल (प्राकृतिक) व हर्बल सौन्दर्य प्रसाधनों के निर्माण मानको के लिए विभिन्न मन्त्रालयो के नियमो में एक रूपता ला कर ,सामान्य जनता को लुभावने वादों के साथ मुर्ख बनाने की प्रणाली पर रोक लगायी जा सके।

तुलनात्मक अध्यन में खुली पोल

यही नहीं अपितु रस शास्त्र विभाग में एक विशिष्ट विभागीय संगोष्ठी में शोध छात्र विनीत शर्मा ने इस विषय पर तुलनात्मक अध्ययन कर सभी पक्षों को प्रस्तुत किया। संगोष्ठी प्रोफसर आनन्द चौधरी ने कहा, सभी तथ्यों पर सारगर्भित चिन्तन मनन करने पर निष्कर्ष यही है कि आयुर्वेदीय, नेचुरल (प्राकृतिक) व हर्बल सौन्दर्य प्रसाधनों के लिए एक रूपता लिये हुए नये नियमो की अनिवार्य आवश्यकता है जिससे की सामान्य जन के साथ हो रहे सामाजिक, आर्थिक एवं चिकित्सकीय खिलवाड़ को वरीयता क्रम में यथाशीघ्र रोका जा सके। प्रोफसर केआरसी रेड्डी ,प्रोफसर नीरज कुमार एवं डा. लक्ष्मी नारायण गुप्ता आदि ने भी इस विषय पर अपने विचार रखा। इस विशिष्ट संगोष्ठी में डा. विकास कुमार ,डा. शोभा कटारा ,डा. सुमित्रा , डा. सुकृत ,सुश्री हेमलता रेनू , श्रुति पाण्डे आदि मौजूद थे।

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