लगातार तीसरी बार मिली ‘हार’, सांसदी के लिए अजय राय ने लगाया था राजनैतिक कैरियर पर ‘दांव’

वाराणसी। एक दशक पहले तक भाजपा के जिन जमीनी नेताओं की बात की जाती उनमें अजय राय का नाम सबसे उपर रहता था। रिकार्ड नौ बार जीत हासिल करने वाले श्यामदेव राय चौधरी के साथ जिसे भाजपा सरकार के मंंत्रीमंडल में स्थान मिला था वह अजय राय ही थे। एक दशक पहले जब भाजपा के कद्दावर नेता मुरली मनोहर जोशी जब काशी से चुनाव लड़ने के लिए आये तो यहां से दावेदारों में सबसे उपर जो नाम था वह अजय राय का था। सांसद बनने की खातिर कोलअसला के विधायक ने न सिर्फ भाजपा की सदस्यता छोड़ी बल्कि सपा के टिकट पर मैदान में उतर आये। उनका यह निर्णय कितना सही था यह इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अपनी जिस सीट पर वह छह बार से जीतते आ रहे थे पिछले विधानसभा चुनाव में उस पर भी पराजय का सामना करना पड़ा। इस दफा भी कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में तीसरे स्थान पर संतोष करना पड़ा।

डिप्टी सीएम बनना तो तय रहता

अजय राय के करीबियों का कहना है कि ‘नेताजी’ का निर्णय सही नहीं था। यदि वह भाजपा मे बने रहते तो इस बार डिप्टी सीएम बनना तो तय था। शायद मुख्यमंत्री के दावेदार रहते। कांग्रेस में आने के बाद लगातार दो लोकसभा चुनावों में तीसरा स्थान मिलना और अपनी परम्परागत सीट पर हारना उनकी लोकप्रियता पर असर डालने जैसा रहा। खास यह कि उनके रोड शो में पिछली दफा भी लाखों लोगों की भीड़ जुटी लेकिन वोट में तब्दील नहीं हो सकी।

जमीनी और जुझारू नेता की छवि

जिस समय भाजपा विपक्ष में थी और जिला मुख्यालय पर कोई विरोध प्रदर्शन रहता था तो वहां जुटने वाली भीड़ का अधिकांश हिस्सा अजय राय के समर्थकों का रहता था। जमानी और जुझारू नेता की छवि कुछ ऐसी थी कि भाजपा छोड़ कर सपा से चुनाव लड़ने के लिए उन्होंने विधानसभा से इस्तीफा तक दे दिया था। इसके बाद निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में सत्तारूढ़ बसपा के प्रत्याशी को पराजित कर जता दिया था कि लोगों का समर्थन किस तरह साथ है। पूर्वांचल में उनकी छवि मनोज सिन्हा से कम नहीं थी लेकिन हार का सिलसिला समर्थकों की आस जोड़ता जा रहा है।

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