मनोज और महेन्द्र का राह में कांटा के लिए कांग्रेस ने लिया ‘कुशवाहा’ का सहारा, गठबंधन के लिए राह होगी आसान!

वाराणसी। केन्द्रीय रेल राज्य और संचार मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) को उनके समर्थक ‘विकास पुरूष’ की संज्ञा देते हैं। अपने संसदीय क्षेत्र गाजीपुर के अलावा पूर्वांचल में भी उन्होंने ट्रेनों पर ध्यान ही नहीं दिया बल्कि अरसे बाद संख्या बढ़ायी। दूसरी तरफ भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डा. महेन्द्रनाथ पाण्डेय को भी पिछली बार किसी ने टक्कर दी ती वह सपा का प्रत्याशी नहीं बल्कि बसपा का था। गठबंधन ने पूर्व सांसद अफजाल अंसारी को समायोजित करने की खातिर सीटों का फेरबदल कर लिया लेकिन कांग्रेस ने दोनों को रोकने की खातिर नये पैंतरे के रूप में अब ‘कुशवाहा’ दांव चला है। अरवों रुपये के एमआरएचएम घोटाले में लंबे समय तक जेल मे रहे बसपा सुप्रीमों के पूर्व करीबी बाबूसिंह कुशवाहा की पत्नी और उनकी पार्टी के नेता अजीत कुशवाहा को उतार कर भाजपा के दिग्गजों की राह रोकने की कोशिश की गयी है। साफ है कि कांग्रेस भले जीते नहीं लेकिन इनके जरिये गठबंधन की परोक्ष रूप से मदद जरूर करेगी।

शिवकन्या के लिए बदली है सीट

कांग्रेस ने गाजीपुर लोकसभा से मनोज सिन्हा के खिलाफ अजीत प्रताप कुशवाहा को उतार दिया है। अजीत प्रताप सिंह पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा की पार्टी के नेता हैं उन्हें कांग्रेस ने अपने टिकट पर मैदान में उतारा है। गाजीपुर लोकसभा सीट पर कुशवाहा वोटरों की तादाद को देखते हुए कांग्रेस का यह बड़ा दांव माना जा रहा है। पिछली बार मोदी लहर के बावजूद यहां से बाबू सिंह कुशवाहा की पत्नी शिवकन्या कुशवाहा सपा के टिकट पर चुनाव लड़कर महज 32452 वोटों से मनोज सिन्हा से हार गयी थीं। शिवकन्या को इस बाद चंदौली के मैदान में स्थान मिला है। यहां पिछली बार बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले अनिल मौर्या दूसरे स्थान पर रहे थे।

लगातार दूसरा चुनाव नहीं जीते हैं ‘दिग्गज’

मनोज सिन्हा अब तक तीन बार सांसद चुने गये हैं जबकि इतनी ही बार पराजय का सामना करना पड़ा है। पिछली बार भी अफजाल अंसारी के मुकाबले में शिकस्त हासिल हुई थी। उधर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डा. महेन्द्रनाथ पाण्डेय ने अपनी राजनीति की शुरूआत गृह जनपद की सैदपुर विधानसभा सीट से की थी। राम मंदिर आंदोलन के समय जीत मिली लेकिन इसके बाद हार के साथ जिला छोड़कर भदोही की शरण ली। वहां भी पराजय का सामना करना पड़ा। पिछली बार मोदी लहर में जीत हासिल हो गयी लेकिन इस दफा विरोधियों से अधिक पार्टी में ही हराने वाले मौजूद हैं। मनोज सिन्हा हो या महेन्द्रनाथ दोनों में समानता एक है कि लगातार दूसरा चुनाव अब तक नही जीते हैं।

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