रजनीकांत वशिष्ठ

‘सबते भले भीख के रोट’ यह एक कहावत है। पर इस कहावत के जरिये रंचमात्र भी इरादा यूपी के किसान को मिली एक लाख की कर्जमाफी को गलत कदम बताने का नहीं है। बल्कि ऐसा कर के एक तो योगी सरकार ने मोदी के जनता से किये वादे को जमीन पर उतार कर साकार किया है। दूसरे यूपी के बेहाल किसान को कुछ ऐसी राहत मिली है जैसे किसी प्यासे को ओस की बूंद मिल जाये। पर बुरा न माना जाये कर्ज माफी है तो भीख की आदत के ही समान जो आगे भी इसी तरह माफी की उम्मीद में किसान को और कर्जा लेने को प्रेरित करती है। दरअसल किसान को आज जिंदा रहने के लिए आय चाहिए, कर्ज राहत नहीं। यह तब होगा जब कृषि का जीर्णोद्धार हो, पैदावार में बढ़ोतरी हो और किसान को उपज का लागत से ज्यादा दाम मिले।

योगी सरकार को इस बात के लिए साधुवाद कि उसने चुनाव में किए गए वादे को पवित्र मानते हुए प्रदेश के किसान को ताजा कर्ज माफी के रूप में फौरी राहत अपनी पहली कैबिनेट बैठक में ही दे दी है। वो भी अपने बूते केन्द्र सरकार से एक पैसा लिए बगैर, इस सारे पैसे का इंतजाम खुद अपने संसाधनों से योगी सरकार को करना होगा। फौरी राहत तो हो गई अब आगे कृषि क्षेत्र का कैसे विकास हो इस बारे में नयी सरकार को विस्तार और गंभीरता के साथ विचार करना होगा। इस बात पर भी विचार करना होगा कि देश में उपप्रधानमंत्री चौधरी देवी लाल ने 1990 में कर्ज माफी के जिस सिलसिले की शुरुआत की थी। उसी को 2008 में कांग्रेस के वित्त मंत्री पी चिदम्बरम ने 3 करोड़ लघु और सीमांत किसानों का 60 हजार करोड़ रुपया माफ कर के आगे बढ़ाया। 2009 में कांग्रेस ने इसमें 20 परसेंट और बढ़ोतरी कर के 71 हजार करोड़ की कर्ज राहत दान में दी।

देवी लाल तो इसका राजनीतिक लाभ नहीं उठा पाए। पर कांग्रेस को इसका पुण्य अगले साल 2009 में चुनाव में विजय के रूप में मिल गया। क्या ये एक प्रकार की चुनावी रिश्वत नहीं थी ? क्या इससे किसानों का कल्याण हो गया ? क्योंकि अगर यह कदम देश में किसानों की बढ़ती आत्महत्याओं को रोकने के इरादे से उठाया गया था। तो फिर उसके बाद भी किसानों की आत्महत्या क्यों नहीं रुकी। आज हर आधे घंटे में एक किसान आत्मघात कयों कर रहा है ? इस बार भी 2017 के चुनाव में कांग्रेस ने ऐसा ही दबाव बनाया जिससे भाजपा को कर्ज माफी का वादा करने को मजबूर होना पड़ा और कांग्रेस का दांव उल्टा पड़ गया।

खैर लोकतंत्र में चुनाव के दौरान हर पार्टी को अपने वादे और इरादे जाहिर करने का हक है। इस पर तो रोक लगाई नहीं जा सकती। मोबाइल, लैपटॉप, टीवी, मिक्सी, कूलर, साड़ी, पंखा का वादा हर चुनाव में हर राज्य में कोई न कोई राजनीतिक दल करता ही आया है और करता ही रहेगा। पर बात यहां किसान की बदहाली की हो रही है। पढ़ते आए थे कि भारत एक कृषि प्रधान देश है। जब पूरी तरह कृषि आधारित अर्थव्यवस्था यहां थी तब खेती फायदे का सौदा हुआ करती थी। पूरा परिवार खेती में जुटता था, दूध दही भी बेचने की जरूरत नहीं होती थी। पर चार सदी पहले की औद्योगिक क्रांति और अब पचास साल से तकनीकी क्रांति ने खेती के साम्राज्य को झकझोर कर रख दिया है। चमकदार शहरी जिंदगी की ललक ने गांव के युवा को गांव से छीन लिया है। गांवों में परिवार बिखरा है, किसानों का खासकर उनके बच्चों का खेती से मन उचट गया है। किसान को अब खाद, बीज, दवाई, पानी, बिजली के अलावा श्रम का भी मोल चुकाना पड़ रहा है। उत्पादन की लागत बढ़ी है और सरकार उपज के दाम तय करती है वो भी बिचौलियों के मार्फत। यानी किसान दूसरे व्यवसायों की तरह अपनी लागत भी नहीं निकाल सकता। तो ऐसे में ऐसी कर्जमाफियों से कब तक और क्या होगा ?

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि देश में अब तक किसानों के कर्जे के 90 हजार करोड़ रुपये माफ किए जा चुके हैं। फिर भी वही ढाक के तीन पात, किसान का भला तो नहीं हुआ सरकारी या सहकारी बैंकों का दिवाला निकल गया। यह ऐसा है कि सोने का अंडा देने वाली मुर्गी का पेट फाड़ कर सारे अंडे एक साथ निकाल लेना। बैंकिंग सिस्टम में कृषि ऋण बैड लोन माना जाने लगा है।

सरकारी महाजनी खोखला होने के कारण आज किसान सेठ साहूकारों के जाल में उलझा है। एक रिपोर्ट के अनुसान देश के 11 करोड़ किसानों में से केवल 2 करोड़ ही बैंकों से कर्जा लेते हैं। बाकी लघु और सीमांत किसान साहूकारों से ही कर्जा पाते हैं वो भी 30 रुपया सैकड़ा ब्याज पर। वो 2008,09 और अब 2017 में कवर होने से रहा। तो इससे यह ताजा कर्ज माफी भी समावेशी नहीं हो पाएगी। एक अनुमान के अनुसार 1990 में एक एकड़ में खेती की औसत लागत साढ़े 3 हजार रुपए आंकी गई थी जो 2008 आते आते साढ़े 23 हजार तक पहुंच गई है और अब तो तीस हजार के पार होगी। एक टन गन्ने की लागत आती 1600 रुपये और सरकार इससे कम का मिनिमम सपोर्ट प्राइस तय कर देती है। देश के एक किसान परिवार का औसत मासिक खर्चा लगभग 8 सौ रुपया आंका गया है जिसकी 55 फीसदी रकम खाने पर खर्च हो जाता है। बाकी में क्या ओढ़े क्या बिछाए। बताओ कैसे गुजारा हो किसान का। दरअसल एक सकारात्मक नोट पर काम शुरू करने वाली योगी सरकार के यह एक गंभीर चिंतन का विषय होना चाहिए। ताकि कोई दूरगामी हल सामने आ सके।

वैसे कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मिल्ट मैक गिफिन का टिकाउ खेती के बारे में बड़ा दिलचस्प विचार आजकल चर्चित हुआ है। वो ये है कि सरकारें खेती में दखल देेने से बचें। किसान सरकार के हस्तक्षेप को कृषि से बाहर देखना चाहते हैं क्योंकि सरकार उनकी उपज का दाम तय करती है। कृषि में भी अन्य व्यवसायों की तरह उत्पाद का लाभकारी मूल्य तय करने का अधिकार उत्पादक का ही होना चाहिए। सरकारें कर्ज माफी के बजाय अगर मदद करना ही चाहती हैं तो खाद, बीज, पानी, बिजली या मार्केटिंग के लिए रिलीफ पैकेज पर विचार करे तो यह अच्छा होगा। खेती से जुड़े अति लघु, लघु और मझोले व्यवसाय का रास्ता सुगम कर सके तो करे। गांव का नौजवान पढ़ लिख कर गांव में ही बस जाना चाहे ऐसी सूरते हाल बना सके तो बनाए। वो किसान को आश्रित नहीं आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम कर सके तो करे। तो शायद आने वाले कुछ सालों में किसान का भला हो जाए।

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