वाराणसी। जैव चिकित्सा अपशिष्ट पर्यावरण के लिये बेहद नुकसान दायक हैं। कमिश्नर दीपक अग्रवाल ने गुरूवार को आयोजित बायो वेस्ट मैनेजमेंट अभिमुखीकरण कार्यशाला में इसके नियमित डिस्पोजल पर विशेष जोर दिया। उन्होने कहा कि जैव चिकित्सा अपशिष्ट का डिस्पोजल सही ढ़ग से न करने पर इसका खामियाजा सभी को भुगतना पड़ेगा। जैव चिकित्सा अपशिष्ट के प्रबन्धन एवं उसके डिस्पोजल हेतु ट्रासपोरेटेशन के दौरान विशेष सर्तकता बरतने पर जोर देते हुए उन्होने कहॉ कि निर्धारित स्थान पर ही इसका डम्पिग किया जाना सुनिश्चित कराया जाय। इसके लिये उन्होने प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी को इसका औचक निरीक्षण किये जाने का निर्देश दिया। पर्यावरण प्रदुषण का संतुलन बनाये रखने की दिशा में कार्यशाला को सार्थक पहल बताते हुए इसके प्रगति की अपने मासिक समीक्षा बैठक में नियमित समीक्षा किये जाने पर जोर दिया।

बनता जा रहा है बड़ा पर्यावणीय संकट

कमिश्नर ने कहा कि कचरा किसी भी रूप में हो, वह देश और दुनिया के लिये एक बहुत बड़ा पर्यावरणीय संकट बनता जा रहा है। हम जानते हैं कि हर शहर में कई निजी व सरकारी अस्पताल होते हैं, जिनसे प्रतिदिन सैकड़ों टन चिकित्सकीय कचरा निकलता है। इस भागम-भाग की जिंदगी में बीमारियाँ बढ़ती जा रही हैं। बीमारों की संख्या बढ़ रही है और अस्पतालों की संख्या भी बढ़ रही है और उसी हिसाब से उन बीमार व्यक्तियों के इलाज में प्रयुक्त होने वाले सामानों की संख्या बढ़ रही है। जिन्हें इस्तेमाल करके कचरे में फेंक दिया जाता है, जो एक बायोमेडिकल कचरे का रूप ले लेता है। यही बायोमेडिकल कचरा हमारे-आपके स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिये कितना खतरनाक है, इसका अंदाजा आप और हम नहीं लगा सकते हैं। इससे न केवल और बीमारियाँ फैलती हैं। बल्कि जल, थल और वायु सभी दूषित होते हैं। ये कचरा भले ही एक अस्पताल के लिये मामूली कचरा हो लेकिन मेडिकल काउंसिल आॅफ इंडिया के अनुसार यह मौत का सामान है। ऐसे कचरे से इनफेक्सन, एचआईवी, महामारी, हेपेटाइटिस जैसी बीमारियाँ होने का भी डर बना रहता है।

जहां मिलती रोग से मुक्ति वहीं से फैलाव के संकट

ईएम एक्सपर्ट यूपीएचएसएसपी सलोनी गोयल ने जैव चिकित्सा अपशिष्ट प्रबन्धन पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि डब्ल्यूएचओ ने इसे महामारी माना है। उन्होने जोर देते हुए कहा कि कैसी विडंबना है कि अस्पताल जहां हमें रोगों से मुक्ति प्रदान करता है, वहीं यह विभिन्न प्रकार के हानिकारक अपशिष्ट यानि कचरा भी छोड़ता है। लेकिन ये हमारी समझदारी पर निर्भर करता है कि हम इससे कैसे छुटकारा पाये। ऐसा तो हो नहीं सकता कि अस्पतालों से कचरा न निकले, परंतु इसके खतरे से बचने के लिये इसका उचित प्रबंधन और निपटान आवश्यक है। कार्यशाला में अन्य वक्ताओं ने भी विस्तार से प्रकाश डाला। इससे पूर्व कमिश्नर दीपक अग्रवाल ने दीप प्रज्जवलित कर कार्यशाला का विधिवत् उद्घाटन किया। कार्यशाला में डा. अंशु सिंह संयुक्त निदेशक, डा. मनीषा सिंह सेंगर संयुक्त निदेशक, मुख्य चिकित्सा अधिकारी डा. वीबी सिंह, डा. एनपी सिंह सहित लगभग 200 प्रतिभागी उपस्थित रहे।

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