ऊर्जा के संसाधन छिपे हैं समुद्र के तल पर, अगली एक शताब्दी का भंडार पाने पर पांच ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था लक्ष्य आसान

वाराणसी। ऊर्जा की लगातार बढ़ती आवश्यकताओं और खत्म होते संसाधनों के मद्देनजर विकास के लक्ष्यों को हासिल करना आसान नहीं है। ऐसे में संसाधनों के सिमटने की आज की चुनौतियों का समाधान महासागरों के तल में छिपा है। गोवा स्थित राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रोफेसर सुनील कुमार सिंह के अनुसार महासागरों के अध्ययन और अनुसंधान पर पहले से अधिक जोर देने की जरूरत है। बीएचयू के भौमिकी विभाग द्वारा माइक्रो पैलियोनटोलॉजी और स्ट्रैटीग्राफी पर आयोजित 27वें भारतीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रो. सिंह ने कहा कि समुद्र न केवल जैविक और अजैविक सम्पदा से भरपूर हैं बल्कि मानव जाति के लिए बहुत उपयोगी हैं क्योंकि ये संसाधनों, मॉनसून, जलवायु और मानव गतिविधियों को प्रभावित करते हैं।

दूसरे संसाधन खत्म होने के कगार पर

उन्होंने कहा कि मानव अधिकतर संसाधनों को खत्म करने के बहुत करीब पंहुच चुका है, जबकि प्रगति की रफ़्तार के अनुरूप इनकी मांग लगातार बढ़ती जा रही है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान के अध्ययनों में ये निकल कर आया है कि महासागरों में विभिन्न सम्पदा और ऊर्जा के इतने अथाह भण्डार हैं कि उनका दोहन कर भारत की अगले सौ वर्षों तक की ऊर्जा जरूरतों को पूरा किया जा सकता है। उन्होंने यहां तक कहा कि 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था बनने के भारत के लक्ष्य की तरफ बढ़ने की दिशा में महासागरों का महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है। उन्होंने प्रदूषण से निपटने और जलवायु परिवर्तन की समस्या के संबंध में भी महासागरों की भूमिका को रेखांकित किया। बुधवार को सम्मेलन के तीसरे और अंतिम दिन दुनिया भर से आए विशेषज्ञों ने जलवायु, महासागर और तमाम संबंधित विषयों पर अपने शोध प्रस्तुत किये।

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