मीरजापुर। प्रदेश के नक्सली हिंसा से प्रभाविज जनपदों में केन्द्र की तरफ से करोड़ो रुपये विभिन्न योजनाओं के तहत दिये जाते हैं। वाबजूद इसके नक्सल प्रभावित 105 गांवों में शिक्षा व स्वास्थ्य तो दूर बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं। जेएनयू,बीएचयू,डीयू तथा महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के छात्रों द्वारा स्थापित होप संस्था के दल ने नक्सल प्रभावित गांवों में जाकर वहां की मूल समस्याओं व जमीनी हकीकत को जाना तो हाल-बेहाल मिले। राजगढ़ व मड़िहान ब्लाक के गांव में सुबह 6 बजे से रात 9 बजे तक घर-घर जाकर और चौपाल के माध्यम से सर्वे किया गया और उनकी सभी समस्याओं को नोट किया गया। होप के युवाओं ने 45 डिग्री तापमान में रहकर ग्रामीणों की समस्या जैसे पानी,शिक्षा,स्वास्थ्य,पीएचसी में डॉक्टर की मनमानी,बाहर की दवाई लिखना,पानी को लेकर संकट को लेकर जमीनी हकीकत जो देखी उससे महसूस किया वह बहुत भयावह था।

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जारी है बाल विवाह, पीने को नहर का गंदा पानी

छात्रों के मुताबिक आज भी लोग घास व पत्ते के घरों में रहने के लिए मजबूर हैं। गांव में बाल विवाह का प्रचलन जारी है। आज भी उस क्षेत्र के लोगो को नहर का गंदा पानी पीने के लिए मजबूर हैं। शोषण भी अपने तरीके से फल फूल रहा है। स्वरोजगार जैसे शब्द अंधेरे में कहीं खो गए। अगर किसी गांव में एक्का दुक्का यदि किसी ने स्नातक तक पढ़ाई कर भी ली है तो वो दूसरे प्रदेश में जाकर मजदूरी का कार्य करना पड़ रहा है। सरकार की कई योजनाओं का उन्होंने नाम तक नहीं सुना है,कुछ लोगो के कारण पूरा गांव नक्सल जैसे आतंक से बदनाम है,कई कार्य सिर्फ फाइल तक है,अगर नक्सल को जड़ से खत्म करना है तो वहां के लोगो को जल्द से जल्द मुख्य धारा में जोड़ा जाए और कुदरती कानून वहां लागू किया जाए जिसमें सभी का सम्मान हो। गांव पहाड़ों पर बसे और पानी की समस्या होने के कारण गांवों में किसान नाम की प्रजाति गांव से खत्म हो रही है। कुछ गांव में तो चौंकाने वाली बातें सामने आई कि परिवार के कुछ लोग शहरों में जाकर तीन-तीन महीने भीख मांगने का कार्य करते है फिर वो वापस आते है तो अन्य सदस्य जाते है। युवाओं का मानना है कि इन सब के पीछे का कारण अशिक्षा है, रंग रोगन सुसज्जित स्कूल तो है शिक्षक भी है लेकिन शिक्षकों की गुणवत्ता में भारी कमी है,नक्सल प्रभावित 105 गांव में शिक्षा की स्थिति भयावह है।

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खाने के लिए ही जाते हैं स्कूल!

कई गांवों में सर्वे के दौरान पाया कि बच्चे मिडल स्कूल के है लेकिन उन्हें अ,इ,उ,ऊ ओर गिनती तक का ज्ञान नहीं है। किसी किसी गांव के बच्चे केवल मिड -डे- मिल खाने जाते है और फिर वापस चले आते है। सर्वे में बच्चों की अपेक्षा लड़कियों की शिक्षा का स्तर निम्न व न के बराबर है। जिनके माता-पिता शिक्षित है उनके ही बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त कर पा रहे है। कई ऐसे बच्चे जिनका नाम सरकारी तथा प्राइवेट स्कूल में लिखवाया गया। शिक्षा प्राप्त करने का उद्देश्य सिर्फ लोभ है जैसे खाना,फल,दूध का मिलना शिक्षा के असली महत्व से उन्हें कोई मतलब नहीं। नक्सल प्रभावित गांव में बहुत कम उम्र के बच्चे भी नशे में लिप्त हैं इसलिए टीचर पढ़ाने से कतराते हैं।

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