वाराणसी। मानव सभ्यता की विकास-यात्रा आज उत्तर आधुनिकता के मुहान पर खड़ी है। इस विकासयात्रा में हम देखें तो मानव सभ्यता का शुरूआती दौर जाति, धर्म एवं सम्प्रदाय आदि से विरक्त था। जैसे-जैसे मानव, सभ्यता के पायदान को पार करता गया, वैसे-वैसे वह जाति, धर्म एवं सम्प्रदाय जैसी वैचारिकी से पोषित होता गया। यह स्थिति यहाँ तक पहुंची कि मानव, मानव से घृणा करने लगा। मानव-मानव से पशुवत व्यवहार करने लगा। ऐसी स्थिति में डॉ. अम्बेडकर का इस धरा में आना ईश्वरीय सत्ता से कम नहीं था। बीएचयू में गुरुवार को अम्बेडकर के 63वें परिनिर्वाण दिवस पर आयोजित परिचर्चा में मुख्य वक्ता प्रो. बी राम ने कहा कि डॉ. अम्बेडकर ने सही मायने में भारत की सच्ची तस्वीर को पुन:स्थापित किया, सबकी भागीदारी को सुनिश्चित किया। आज उनके प्रयासों का ही परिणाम है कि जहाँ एक तरफ दलित समाज को समाज में भागीदारी सुनिश्चित हुई है, वहीं महिलाएं कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ रही हैं।

जीवन अपने में विचार जो कभी मरता नहीं

अध्यक्षता कर रहे बीएचयू समाजकार्य विभाग के समन्वयक प्रो. ओम प्रकाश भारतीय ने कहा कि डा. अम्बेडकर के परिनिर्वाण दिवस पर हम सभी यहाँ उपस्थित हैं, परन्तु मैं कदापि नहीं मानता कि बाबा साहेब हमारे बीच नहीं हैं। उनके विचार, उनके अवदान आज भी भारत की तस्वीर गढ़ने में सहायक हो रहे हैं। आज भी उनके विचार हाशिये को समाज के संबल बन रहे हैं। डा. अम्बेडकर का जीवन अपने आप में एक विचार है और विचारों के संदर्भ में कहा जाता है कि विचार कभी मरते नहीं। डा. अम्बेडकर का आगमन इस धरा पर नहीं होता तो वैश्विक पटल पर भारत की तस्वीर कुछ और ही होती। जिस तरह चिड़िया तिनके-तिनके जोड़ अपने घोसलें को निर्माण करती है, उसी तरह डा. अम्बेडकर ने अपने अनवरत प्रयासों से वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा को व्यवहारिक धरातल पर स्थापित किया। संचालन डा. विमल कुमार लहरी एवं धन्यवाद ज्ञापन डा. अरूणा कुमारी ने किया।

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