**अद्भुत है बनारसी जीवनशैली का मिजाज !!
**आठ दशक बाद सारनाथ से पहली बार बुद्ध का अस्थि अवशेष कलश देश से बाहर भेजा गया श्रीलंका !!
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कहते हैं कि बनारस यानी काशी को क्योटो बनाने के लिए 2520 करोड़ की योजना बनाई गई है. इस स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत सुरम्य काशी, समुन्नत काशी, सुरक्षित काशी, संयोजित काशी, निर्मल काशी, एकीकृत काशी, स्वच्छ काशी आदि प्रोजेक्ट पर काम होना है. कुल लगभग 16 प्रोजेक्ट हैं और यह काम 2015 से 2020 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है. समय तेजी से बीत रहा है और जो कार्य हुआ है, वह नगरवासियों के सामने है. यही कारण है कि अब तेजी से अधिकारी काम करने में जुट गए हैं. ताकि निर्धारित अवधि में इसे पूरा कर सकें. अधिकारी नहीं चाहते कि इस कार्य में कोई अवरोध पैदा हो. इसी कारण शासन-प्रशासन के अधिकारी विश्वनाथ मंदिर काॅरिडोर और गंगा पाथवे की योजना पर तेजी से काम कर रहे हैं.

इसी अभियान के तहत पक्कामहाल में घरों को शासन-प्रशासन द्वारा खरीदने के काम में तेजी आई है. 2-3 मकान और मंदिर ध्वस्त भी किए जा चुके हैं. लेकिन विश्वनाथ मंदिर परिक्षेत्र के इस सौन्दर्यीकरण अभियान से क्षेत्रीय नागरिक और दुकानदार भयभीत हैं. उन्हें आशंका है कि उनके घर और दुकान छीने जाएंगे. वो सवाल पूछ रहे है. और उनके सवाल का किसी के पास कोई जवाब नहीं है. उनके पुनर्वास की भी फिलहाल कोई व्यवस्था नहीं की गई है. और यदि की गई है, तो वह क्या है ? इसे बताने के लिए कोई तैयार नहीं है.

काशी की पहचान यहां की गलियां, मंदिर और गंगाघाट हैं. इसके साथ अगर छेड़छाड़ की जाएगी तो काशी की अस्मिता और पहचान को ही खतरा पैदा हो जाएगा. बनारसियों को यही आशंका सता रही है. दरअसल जो समाज अपने अन्तर्विरोधों के चलते जर्जर हो जाता है, उसे बाहरी ताकतें धन की लालच देकर आसानी से खरीद लेती हैं और फिर शुरू होती है, एक नई सभ्यता की संरचना. जिसकी शुरूआत बनारस की पुरानी बस्ती पक्कामहाल से शुरू हो गई है. जबकि क्षेत्रीय नागरिकों को संगठित कर “धरोहर बचाओ समिति” इस “विकासवादी” अभियान के विरोध में संघर्ष का बिगुल बजा चुकी है. उसके अभियान का नारा है “जान देंगे, घर नहीं” !!

राजघाट पुल से अस्सीघाट तक लगभग दस किमी के क्षेत्र में फैले गंगाघाट के किनारे अधिकांश घाटों की सीढ़ियां भी जर्जर हो गई हैं. दूसरी तरफ गंगा का जलस्तर घटने से संकट और गहरा गया है. लेकिन इस मुद्दे पर कोई बहस नहीं हो रही है. गंगा में बढ़ते प्रदूषण का मूल कारण जलधारा का बहाव रुकना और सीवर का गिरना है. और जब तक यह दोनों काम नहीं होंगे प्रदूषण दूर करने की बात बेमानी होगी.

बनारसी लोगों की अपनी एक जीवनशैली है. यहां की गलियों की ऐसी संरचना है. भीषण गर्मी में भी वहां ताप का असर महसूस नहीं होता है. यहां एक पूरा बाजार फैला है गलियों में. लोगों को जरूरत के सामान उनके घर के आसपास ही मिल जाता है. अनेक विदेशी सैलानी यहां की जीवनशैली से इतने प्रभावित हुए कि वो काशी के ही होकर रह गए. पश्चिम की उपभोक्तावादी संस्कृति से उनका मोहभंग हो गया. और हम उसी उपभोक्तावादी संस्कृति की चकाचौंध से प्रभावित होकर अपनी धरोहर को जमींदोज करने के लिए उस पर बुलडोजर चला रहे हैं. और राजनेता लोगों को यह समझा रहे हैं कि यही “विकास” है. आश्चर्य की बात है कि इस अभियान का नेतृत्व वह राजनीतिक दल कर रहा है, जो सबसे आगे बढ़कर अपने को भारतीय संस्कृति का पोषक घोषित करती है. इसे स्वांग नहीं तो और क्या कहेंगे ?

यहां गलियों में देशी-विदेशी पर्यटक ही नहीं गाय और सांड़ भी आराम से घूमते हैं. क्या स्मार्ट शहर में उनके लिए भी कोई योजना है ? आखिर वो कहां जाएंगे ? शहर उनका भी है. भगवान शिव के प्रतीक हैं सांड़ ! यहां के वशिंदे उन्हे देखते ही बोल पड़ते हैं “महादेव” !!

ऐतिहासिक धरोहर लालकिले के रखरखाव की जिम्मेदारी 25 करोड़ रूपये में डालमिया ग्रुप को देने की खबर से अब काशीवासियों के कान खड़े हो गए हैं. उन्हें आशंका है कि चंद रूपये की खातिर कहीं बाबा विश्वनाथ मंदिर परिक्षेत्र को भी किसी पूंजीपति घराने को न सौंप दिया जाए. पक्कामहाल क्षेत्र की चाय-पान की दुकानों पर ऐसी चर्चाएं अब शुरू हो गई हैं.

#सारनाथ_महाबोधि मंदिर में प्रतिष्ठित होने के आठ दशक बाद पहली बार गौतम बुद्ध का अस्थि अवशेष कलश देश से बाहर श्रीलंका भेजा गया है. 1931 के बाद यह पहला मौका होगा जब बुद्ध पूर्णिमा पर भगवान बुद्ध के अनुयायी सारनाथ में अस्थि अवशेष का दर्शन नहीं कर सकेंगे. बुद्ध पूर्णिमा 30 अप्रैल को है.

महाबोधि मंदिर के सूत्रों के अनुसार यह अस्थि कलश 1928 में दक्षिण भारत में खुदाई के दौरान मिला था. कई तरह की जांच के बाद तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने इसे बुद्ध के अस्थि अवशेष के रूप में प्रमाणित किया था. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तत्कालीन महानिदेशक दयाराम साहनी ने 1931 में महाबोधि सोसाइटी को यह कलश महाबोधि मंदिर का निर्माण होने के बाद सौंपा था. भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया था. उनका जन्म लुंबनी और महापरिनिर्वाण कुशीनगर में हुआ था. उल्लेखनीय है कि मोदी सरकार के विदेश मंत्रालय ने बुद्ध का अस्थि अवशेष कलश श्रीलंका भेजने की इजाजत दी है.

साभार – वरिष्ठ पत्रकार सुरेश प्रताप सिंह के फेसबुक वाल से…

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