वाराणसी। निकाय चुनाव के लिए पीएम के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में सियासी अखाड़ा सज गया है। अखाड़े में उतरने वालों दिग्गजों के चेहरे भी साफ हो गए हैं। बनारस के लिए निकाय चुनाव कई मायनों में अहम है। खासतौर से बीजेपी के लिए निकाय चुनाव अग्निपरीक्षा की तरह है। विकास की कसौटी पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयास कितने खरे उतरते हैं, चुनाव के नतीजों से साफ हो जाएगा। वहीं कांग्रेस, सपा और बीएसपी सरीखी पार्टियां मोदी के तिलिस्म को तोड़ने की एक और कोशिश करेंगी। इन तीनों पार्टियों के पास खोने के लिए कुछ नहीं है लेकिन चुनाव में कामयाबी मिलती है तो इसका संदेश पूरे देश और दुनिया में जाना तय है।

परंपरागत वोटबैंक के सहारे बीजेपी

बनिया वर्ग को शहर के अंदर बीजेपी का सबसे बड़ा सर्मथक माना जाता है। पिछले दो दशक से इस बड़े समाज पर बीजेपी राज करती चली आ रही है। लिहाजा पार्टी ने इस बार बड़ा दांव खेलते हुए पूर्व सांसद शंकर प्रसाद जायसवाल की बहू मृदुला जायसवाल को मैदान में उतार दिया। जियोलॉजी से एमएससी कर चुकीं मृदुला अपने पिता के कारोबार में हाथ बंटाने के साथ ही समाजिक कार्यों से भी जुड़ी रही हैं। शंकर प्रसाद जायसवाल की बहू होने के कारण वो संघ के भी करीबी रही हैं। बताया जा रहा है कि अमित शाह के दरबार में उनके नाम पर मुहर लगी। बीजेपी की कोशिश है कि पार्टी के परंपरागत वोटबैंक को गोलबंद करके जीत हासिल की जाए। इसके अलावा चुनाव में मोदी के द्वारा किए गए विकास कार्यों को भी भुनाया जाए। हालांकि पार्टी की राह इतनी आसान भी नहीं है। स्वच्छता, सड़क और सीवर जैसी बुनियादी समस्याएं अब भी इस शहर में आम हैं। क्योटो का सपना देख रहे शहरवासी अब भी इंतजार है।

शालिनी पर कांग्रेस ने खेला दांव

निकाय चुनाव कांग्रेस के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। खासतौर से शहरी वोटरों का फिर से साथ पाने के लिए पार्टी एकजुट दिखाई पड़ रही है। टिकट के लिए तो वैसे कई दावेदार थे। लेकिन आलाकमान ने पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व. श्यामलाल यादव की पुत्रवधू को मैदान में उतारा। कांग्रेस की सियासत के अंदर श्यामलाल एक ऐसा नाम थे जो हर किसी के लिए स्वीकार्य था। लिहाजा पार्टी ने शामिली को मेयर पद का टिकट थमा दिया। पिछले चुनाव में प्रत्याशी रहे डॉक्टर अशोक सिंह ने रामगोपाल मोहले को कड़ी टक्कर दी थी। हालांकि लोकसभा और विधानसभा चुनाव में पार्टी का ग्राफ लगातार गिरता गया। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी की गुटबाजी को दूर करना है। इसके अलावा मोदी विरोधियों को अपने पाले में लाना। दरअसल शहर के अंदर मुस्लिमों का एक बड़ा तबका अब भी कांग्रेस के साथ है। विधानसभा चुनाव में भी सपा और बसपा के मुकाबले मुस्लिमों ने कांग्रेस का हाथ थामा। सियासी पंडित ये मान रहे हैं कि अगर कांग्रेस मुस्लिमों के साथ अपने परंपरागत वोटबैंक को साथ लाने में कामयाब होती है तो कुछ हद तक बात बन सकती है।

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बीजेपी को टक्कर देने के लिए तैयार है सपा

समाजवादी पार्टी ने मेयर पद के लिए साधना गुप्ता को मैदान में उतारा है। दिग्गज राजनैतिक परिवार से जुड़ी साधना की गिनती सपा की तेजतर्रार नेताओं में होती है। हाल के दिनों में उनका कद पार्टी में लगातार बढ़ रहा था। मेयर का पद भले ही बीजेपी के पास रहा हो लेकिन पार्षदों की संख्या में सपा हमेशा ही बीस साबित रही है। पिछले चुनाव में भी संख्या बल में सपाई बीजेपी के मुकाबले आगे थे। दूसरी पार्टियों के मुकाबले सपा के अंदर गुटबाजी कुछ कम है लेकिन सवाल इस बात का है कि क्या पार्टी बीजेपी को टक्कर देने में कामयाब हो पाएगी। वहीं अगर बीएसपी की बात करें तो पार्टी पहली बार निकाय चुनाव में हिस्सा ले रही है। पार्टी ने मेयर पद के लिए अधिवक्ता सुधा चौरसिया के नाम पर मुहर लगाया है। बीकॉम,बीएड और एलएलबी कर चुकी सुधा 2009 से पार्टी से जुड़ी हैं और संगठऩ में कई महत्वपूर्ण पदों पर रह चुकी हैं।

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