वाराणसी। पिछले तीन दशकों से अपने रणनीतिक कौशल के चलते विरोधियों को मात देने वाले पूर्व एमएलसी उदयनाथ सिंह ‘चुलबुल’ का निधन परिवार के लिए बड़ा झटका है। बड़े पुत्र सुशील भले तीन बार विधानसभा का चुनाव जीते हो लेकिन पर्दे के पीछे से इसकी पटकथा लिखने वाले चुलबुल थे। भाई बृजेश सिंह जिस सीट से एमएलसी है उस पर परिवार का कब्जा चुलबुल की जीत के बाद से ही हुआ था। परिवार के सामने उनकी राजनैतिक विरासत को संजोना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। इसमें परिवार कितना सफल होता है यह तो वक्त बतायेगा लेकिन राजनीति में उनके कौशल का लोहा धुर विरोधी भी मानते थे।

चुलबुल के चलते परिवार की राजनैतिक छवि

चुलबुल ने 90 के दशक में जिला पंचायत के जरिये राजनीति में कदम रखा और ढाई दशक में कपसेठी हाउस को पूर्वांचल के चुनिंदा राजनैतिक घराने में तब्दील कर दिया। वह एमएलसी तीन जनपदों के थे लेकिन गाजीपुर और जौनपुर में भी उनके खासे सम्पर्क थे। यह उन्हीं की देन थी कि जन्मभूमि से दूर स्थित इलाके में सुशील ने चुनाव ही नहीं लड़ा बल्कि मजबूत प्रतिद्वंदियों को परास्त कर अलग मुकाम हासिल किया।

परिवार को हो चुका है एहसास

जिला पंचायत में पिछले दो दशकों से कपसेठी हाउस का प्रत्यक्ष का परोध रूप से कब्जा बरकरार रहा है। बड़ी बहू किरन और छोटे पुत्र सुजीत सिंह डाक्टर तो अध्यक्ष रह चुके हैं जबकि काफी दिनों तक खुद चुलबुल कार्यवाहक अध्यक्ष रहे। इस दौरान कन्हैयालाल गुप्ता, मधुकर मौर्या समेत जिसके खिलाफ कपसेठी हाउस ने अविश्वास प्रस्ताव पेश किया वह पास ही हुआ। चुलबुल की बीमारी के दौरान कुछ माह पहले मौजूदा अध्यक्ष अपराजिता सोनकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव सुशील ने पेश कराया था। इस बार अस्वस्थता के चलते चुलबुल कुछ नहीं पा रहे थे जिसका नतीजा रहा कि प्रस्ताव पास नहीं हो सका। परिवार को भी इसका एहसास है कि चुलबुल के सम्पर्को को संजोना आसान नहीं है लेकिन इसके लिए पूरा कुनबा एकजुट दिख रहा है।

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