बीएचयू में अभी शायद 4 या 5 साल पहले तक पढ़ने, घूमने, नौकरी करने वाले वीटी की पहली मंजिल से गूंजने वाले इस कर्णप्रिय भजन से वाकिफ होंगे। इसलिए बता रहा हूं क्योंकि ये आवाज़ अब कभी नहीं सुनाई पड़नी है…मुझे अभी कुछ देर पहले ही पता चला।
मिठाई लाल…हां यही नाम था कानों के रास्ते सीधे दिल में उतर जाने वाली इस आवाज़ के मालिक का। दोनों आंखों से लाचार मिठाई लाठी टेकते वीटी पहुंचते और लगभग पूरा दिन वहां कोई न कोई भजन साधते रहते।संगतकार भी स्थायी नहीं थे। कभी आसपास के कुछ संगीतप्रेमी तो कभी संगीत के कुछ छात्र। मेरी जानकारी के मुताबिक उन्हें इसके बदले कुछ नहीं मिलता था लेकिन प्रभु की आराधना का शायद यही तरीका था मिठाई लाल का।

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अनुज नीलाम्बुज (तसवीर इन्हीं से साभार ली गयी है) से ये भी पता चला कि मिठाई लाल आकाशवाणी से भी जुड़े थे। होली में फाग के प्रसारण के समय यही याद किये जाते थे।
संगीत साधकों की स्थली रीवा कोठी में मिठाई लाल का तब तक बसेरा रहा जब तक वहां रहने के लिए सिर्फ संगीत की जरूरत थी। परिचय पत्र संस्कृति प्रभावी हुई तो कला गौड़ हो गयी और बीएचयू के हाकिमों ने मिठाई लाल को निकाल फेंका। इस जगह से फिर भी उनका मोह नहीं छूटा और वहीं फुटपाथ पे उन्होंने ठिकाना बना लिया। भला हो बनारस के लोगों का जिनमें बनारसीपन अब भी कहीं जिंदा है…मिठाई लाल को जब तक संभव हुआ भोजन आदि की मदद की आसपास के लोगों ने। लेकिन तकदीर के मारा यह नेत्रहीन आखिर कब तक संघर्ष करता। उनके संघर्ष को अब पूर्णविराम लग चुका है। मिठाई से मैं कभी बात नहीं कर पाया था, कारण कि जब भी वो दिखे कोई न कोई सुर साधे या आलाप लिए हुए। और व्यवधान उत्पन्न करना सिखाया नहीं गया मुझे…लेकिन अब जब वो नहीं हैं तो मन कचोट रहा है कि एकाध बार रुकावट डाल ही देता तो ठीक होता। मिठाई लाल के दुर्दिन के कारकों के लिए सद्गति की कामना के साथ उन्हीं के बोलों से उन्हें श्रद्धांजलि…
चादर ओढ़ शंका मत करियो,
ये दो दिन तुमको दीन्हि ।
मूरख लोग भेद नहीं जाने,
दिन-दिन मैली कीन्हि ॥
चदरिया झीनी रे झीनी…
– अभिषेक त्रिपाठी।

साभार – (अभिषेक त्रिपाठी के फेसबुक वाल से)

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