गांधी ने नहीं सुभाष ने शुरू किया था ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ आंदोलन! आईसीएचआर में काशी के इतिहासकार का दावा

नई दिल्ली। भारत छोडो आंदोलन महात्मा गांधी द्वारा सन 1942 मे नही बल्कि इसका आगाज 19 मार्च सन 1940 को रामगढ सम्मेलन मे स्वामी सहजानंद सरस्वती तथा सुभाष चंद्र बोस के द्वारा संयुक्त रूप से किया गया था। इसके पुख्ता प्रमाण हैं कि महात्मा गांधी की विलंबित शिरकत 9 अगस्त 1942 को हुई और वह भी बिना किसी कार्यक्रम के । अंग्रेजी राज का विरोध कैसे करना है , क्या करना है इस पर कोई कार्यक्रम नही दिया, बस एक प्रतिकात्मक नारा देकर इतिश्री कर लिया। बस प्रतीक के तौर…

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जननायक सुभाष चंद्र बोस के अवतरण दिवस…पर विशेष

भारत मे आजादी की लडाई की दो धारा थी, एक जो सीधे सीधे अंग्रेजो से टकरा रही थी और संपूर्ण आजादी प्राप्त करने के लिये लड रही थी। इस धारा के महानायक सिदो संथाल, बिरसा मुंडा, तात्या टोपे, स्वामी सहजानंद , चंद्रशेखर आजाद, सुभाष चंद्र बोस जैसे बलिदानी लोग थे। आजादी की लडाई की दूसरी धारा थी कि अंग्रेजो के अधीन हमें होमरूल प्राप्त हो, इस धारा के नेता रानाडे, गोखले, महात्मा गांधी, पं जवाहर लाल नेहरू , राजेन्द्र प्रसाद, नरेन्द्र देव, लोहिया , जयप्रकाश , गोपालाचारी आदि थे ।…

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ये बनारस है जनाब…

अलमस्ती और फक्कड़पन हमारा सिग्नेचर यूं ही नहीं है। जिंदगी को छोड़ कर पैसे-रूतबे के पीछे भागने वाले अक्सर ही नहीं हमेशा ही इसे हेय दृष्टि से देखते हैं। कहते हैं बनारसी बढ़ना नहीं चाहता, दुनिया से नज़रें मिलाना नहीं चाहता…उनको बोलिए आ के इस माहौल से दो-चार हो जाएं। एक तरफ कर्बला को जाते ताजिए तो दूसरी तरफ नाटीइमली का भरत मिलाप। दोनों में अपार भीड़, कहना मुश्किल कि कहां ज्यादा लोग हैं… लेकिन सब कुछ बहते पानी की तरह निकल गया। एक रात पहले भी देर तक दुर्गा…

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चदरिया झीनी रे झीनी…

बीएचयू में अभी शायद 4 या 5 साल पहले तक पढ़ने, घूमने, नौकरी करने वाले वीटी की पहली मंजिल से गूंजने वाले इस कर्णप्रिय भजन से वाकिफ होंगे। इसलिए बता रहा हूं क्योंकि ये आवाज़ अब कभी नहीं सुनाई पड़नी है…मुझे अभी कुछ देर पहले ही पता चला। मिठाई लाल…हां यही नाम था कानों के रास्ते सीधे दिल में उतर जाने वाली इस आवाज़ के मालिक का। दोनों आंखों से लाचार मिठाई लाठी टेकते वीटी पहुंचते और लगभग पूरा दिन वहां कोई न कोई भजन साधते रहते।संगतकार भी स्थायी नहीं…

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किसान को आय चाहिए, राहत नहीं

रजनीकांत वशिष्ठ ‘सबते भले भीख के रोट’ यह एक कहावत है। पर इस कहावत के जरिये रंचमात्र भी इरादा यूपी के किसान को मिली एक लाख की कर्जमाफी को गलत कदम बताने का नहीं है। बल्कि ऐसा कर के एक तो योगी सरकार ने मोदी के जनता से किये वादे को जमीन पर उतार कर साकार किया है। दूसरे यूपी के बेहाल किसान को कुछ ऐसी राहत मिली है जैसे किसी प्यासे को ओस की बूंद मिल जाये। पर बुरा न माना जाये कर्ज माफी है तो भीख की आदत…

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जनादेश के मायने….अब नजरें 2019 पर !

रजनीकांत वशिष्ठ चर्चा तो बहुत थी पर ये यकीन कर पाना मुश्किल हो रहा था कि केसरिया बाने में लिपटा एक योगी देश के सबसे बड़े सूबे यूपी पर राज करेगा। वो भी तब जब यहां एक बटा पांच आबादी मुस्लिमों की हो। एक संन्यासिन उमा भारती देश के सबसे बड़े सूबे एम पी की नाकामयाब मुख्यमंत्री साबित हो चुकी हो और प्रचंड बहुमत से जीते सवा तीन सौ विधायकों के होते सोते मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए एक अदद सांसद को उधार लेने की नौबत आ जाए। उस पर…

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लोकसभा चुनाव के लिए तैयार है मोदी का ये प्लान, इनके लिए खुलेगी सरकार की झोली

वाराणसी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के न्यू इंडिया विजन को यूथ का काफी सपोर्ट मिल रहा है। यूपी समेत पांच राज्यों में हुए चुनाव में यूपी और उत्तराखंड में मोदी लहर जमकर चली। वैसे तो इस लहर में मोदी के कई फैक्टर काम के साबित हुए, लेकिन न्यू इंडिया को लेकर मोदी के विजन को आत्मसात करने वाला यूथ इस इलेक्शन में विकास और बेरोजगारी दूर करने के मुद्दे पर मोदी के साथ खड़ा दिखा। न्यू इंडिया में मिलने वाली जबरदस्त अपॉर्च्युनिटी को लेकर यूथ मोदी पर पूरा भरोसा जता रहा…

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मिला दो दिग्गजों का हाथ, रोचक होगा प्रतापगढ़ का चुनाव

कुंडा (प्रतापगढ़)। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का चरण जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा है, राजनीतिक दलों के बीच जोर-आजमाइश भी बढ़ती जा रही है। उप्र के प्रतापगढ़ जिले की सात विधानसभा सीटों पर इस बार चुनाव में दो दिग्गजों की परीक्षा भी हो रही है। ये कांग्रेस के दिग्गज नेता प्रमोद तिवारी और अपनी हनक के लिए जाने जाने वाले प्रदेश सरकार के मंत्री रघुराज प्रताप सिंह ‘राजा भैया’ है। गौरतलब है कि इस चुनाव में सूबे में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन है। राजा भैया सरकार में मंत्री हैं…

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जिसने हस्तिनापुर जीता, उसी की बनी सरकार !

महाभारत में सत्ता के केंद्र रहे हस्तिनापुर ने भले ही आज अपना प्राचीन गौरव खो दिया हो, पर देश की आजादी के बाद के वर्षो में इसने उस खास निर्वाचन क्षेत्र के रूप में ख्याति अर्जित कर ली है, जिससे इस बात का संकेत मिलता है कि उत्तर प्रदेश में आखिर शासन किसका होगा? यहां के इतिहास में अधिकांश मौकों पर विजेता उम्मीदवार की पार्टी को ही उत्तर प्रदेश की सत्ता हासिल हुई, जिससे मेरठ जिले के हस्तिनापुर को पूर्वद्रष्टा निर्वाचन क्षेत्र होने का तमगा हासिल हुआ। महाभारत में कौरवों…

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यूपी में अखिलेश की वापसी !

रजनीकांत वशिष्ठ यूपी में यादव वंश का राजकुमार अब राजकुमार नहीं रहा, खुद राजा हो गया है। अभी तक साढ़े चार सालों में यूपी के साढ़े चार मुख्यमंत्रियों में से आधे मुख्यमंत्री के विशेषण से दबे अखिलेश यादव अब अपने आप को पूरा मुख्यमंत्री कहलाने के लिये चुनावी मैदान में उतर पड़े हैं। बकौल डिम्पल यादव, वो अभी तक ट्रेनी चीफ मिनिस्टर थे फिर भी अच्छा काम कर गये। अब ट्रेन्ड चीफ मिनिस्टर के तौर से और भी अच्छे से विकास करेंगे। मुलायम परिवार तीन महीने की पीड़ा से उबर…

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