#मगहर “अंतिम समय” कबीर क्यों गए ?

वाराणसी से लगभग 200 किलोमीटर दूर संत कबीरनगर में छोटा सा कस्बा है मगहर ! काशी को मोक्षदायिनी नगरी कहते हैं. सवाल यह है कि आखिर काशी को छोड़कर अंतिम समय में कबीर मगहर क्यों गए ? 16वीं सदी में महान संत कबीर वाराणसी में पैदा हुए. और 500 वर्ष पूर्व 1518 में उनकी मृत्यु मगहर में हुई. मगहर में कबीर की समाधि भी है और मजार भी ! कहते हैं कि कबीर के पार्थिव शरीर को लेकर हिन्दुओं और मुसलमानों में संघर्ष भी हुआ था !! जनश्रुतियों के अनुसार…

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#धरोहर : काशी को क्योटो बनाने की बौखलाहट !!

**अद्भुत है बनारसी जीवनशैली का मिजाज !! **आठ दशक बाद सारनाथ से पहली बार बुद्ध का अस्थि अवशेष कलश देश से बाहर भेजा गया श्रीलंका !! ———————————————————– कहते हैं कि बनारस यानी काशी को क्योटो बनाने के लिए 2520 करोड़ की योजना बनाई गई है. इस स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत सुरम्य काशी, समुन्नत काशी, सुरक्षित काशी, संयोजित काशी, निर्मल काशी, एकीकृत काशी, स्वच्छ काशी आदि प्रोजेक्ट पर काम होना है. कुल लगभग 16 प्रोजेक्ट हैं और यह काम 2015 से 2020 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है.…

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#तोगड़िया को अब काशी आना चाहिए 2019 की तैयारी के लिए !!

#53साल के इतिहास में पहली बार विहिप के अध्यक्ष के लिए वोट डाले गए. पूर्व जस्टिस विष्णु सदाशिव कोकजे नए अध्यक्ष चुने गए. कोकजे को 131 और उनके प्रतिद्वन्द्वि राघव रेड्डी को सिर्फ 60 वोट मिले. पहले रेड्डी ही अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष थे, लेकिन तोगड़िया से उनकी नजदीकी थी, जिसके कारण संघ उन्हें हटाना चाहता था. कोकजे हिमाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल भी रह चुके हैं. #अध्यक्ष चुने जाने के बाद पूर्व जस्टिस कोकजे ने तत्काल बैठक बुलाकर पदाधिकारियों का चयन किया. उन्होंने तोगड़िया की जगह आलोक कुमार को कार्यकारी अध्यक्ष…

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काशी कबहुं न छाड़िये, विश्वनाथ दरबार…

एक अच्छी तस्वीर वो है जो कोई बात पूरी कह जाए… पत्रकारिता की कक्षाओं के बाद पत्रकारिता के छोटे से जीवन में सिखाने वालों से यही सुना-सीखा. फोटो जर्नलिस्ट तो नहीं हूं मगर कैप्शन लिखने की कोशिशें करते रहता था. अमर उजाला में ठाकुर सुनील सिंह के साथ और हिन्दुस्तान में मंसूर चचा, विनय या दूसरे फोटो पत्रकारों के साथ. इस तस्वीर ने न जाने क्यों अटका लिया अपने साथ…इतना कि इसके असली मालिक को इसे शेयर करने से रोक दिया मैंने. इसके असली मालिक का नाम बाद में पहले…

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सरदार भगत सिंह की शहादत पर

भगतसिंह एक ऐसे क्रांतिकामी (क्रांति की कामना करने वाले ) थे, जो अपने अल्प जीवन काल मे निरंतर मुकम्मल क्रांति की राह तलाशते रहे और ऐसा प्रतीत होता है कि अपने जेल प्रवास के दौरान किये गये गहन अध्ययन, चितंन , मनन और संगत के जरिये वे क्रांति की राह तलाशने मे प्रायः सफल हो चुके थे। ऐसी ही असीम संभावना उन्हे भारत की आसन्न क्रांति के संभावित महानायक के रूप मे प्रतिष्ठित करती है । भगत सिंह अपने जीवन को निरंतर सुधारने के साथ ही सामाजिक समझ को भी…

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काशी के रईस झक्कड़ साह

ईस्ट इंडिया कम्पनी के जमाने की बात है. साह गोपालदास ने पक्कामहाल में एक मुहल्ला बसाया था, जिसे आज भी गोपालदास लेन के नाम से जाना जाता है. उनके लड़के साह मनोहरदास ने अपार धन कमाया. अंग्रेजी फौज को रसद सप्लाई कर वह इतना अधिक धन कमाए कि बाद में ईस्ट इंडिया कम्पनी के भी खजांची बने. मनोहरलाल के पुत्र थे साह मुकुंदलाल, जो बहुत बड़े मूडी होने के कारण झक्कड़ साह के नाम से प्रसिद्ध हुए. झक्कड़ साह के जमाने में छत पर धूप में अशरफियों को सुखाने का…

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योगी ने जब बीजेपी को दी पटकनी

2002 में योगी ने भाजपा के प्रत्याशी और तीन बार के विधयक और मंत्री रहे शिव प्रताप शुक्ला के खिलाफ हिन्दू महासभा के बैनर से अपना उम्मीदवार लड़ाया और जिताया भी था। तब योगी का कद इतना बढ़ गया कि भाजपा को इस इलाके में अपनी कमान उनके हवाले करनी पड़ी !! अब लोकसभा के उप-चुनाव में योगी की प्रतीष्ठा लगी है दांव पर. भाजपा प्रत्याशी को जिताने के लिए उन्हें करनी पड़ी है कई चुनावी सभाएं व रैलियांं !! क्या सपा-बसपा के साथ आने से हिल गई है बीजेपी…

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हुरपेटनवाद जिन्दाबाद ! जिन्दाबाद !!

अब मजदूर है ही नहीं ! चौकीदार भी साहब हो गए। सब साहब ! अफसर !! मजदूर तो काम का समय 8 घंटे निर्धारित करने के लिए लड़े और लम्बी लड़ाई के बाद जीते। अब स्वेच्छा से 18 से 20 घंटे काम करने की आपस में ही स्पर्धा चल रही है। होड़ लगी है, वो जो मालिक से लड़ते थे, अब उसके पहरेदार और लठैत हो गए। वह भी खुशी-खुशी ! तो फिर वो मजदूर अपने को मानने को तैयार ही नहीं हैं। उन्हें अब ऐसा मानने में शर्म आती…

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भगत सिंह के हीरो लेनिन बने बीजेपी के विलेन

त्रिपुरा : विधानसभा चुनाव में जीत के 48 घंटे के अंदर बीजेपी समर्थको ने जेसीबी की मदद से लेनिन की प्रतिमा को तोड़ दिया। प्रतिमा तोड़ने वाले भारत माता की जय !! के नारे लगा रहे थे। कई जगह हिंसक झड़पें हुई हैं। यह प्रतिमा साउथ त्रिपुरा डिस्ट्रिक्ट के बेलोनिया सब डिविजन में चौराहे पर लगी थी। प्रतिमा तोड़ने से पहले जेसीबी ड्राइबर को पिलाई शराब, वहां नारेबाजी कर रहे लोग पहने थे भाजपा की टोपी। भगत सिंह फांसी दिए जाने से पहले जेल की कोठरी में पढ़ रहे थे…

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गांधी ने नहीं सुभाष ने शुरू किया था ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ आंदोलन! आईसीएचआर में काशी के इतिहासकार का दावा

नई दिल्ली। भारत छोडो आंदोलन महात्मा गांधी द्वारा सन 1942 मे नही बल्कि इसका आगाज 19 मार्च सन 1940 को रामगढ सम्मेलन मे स्वामी सहजानंद सरस्वती तथा सुभाष चंद्र बोस के द्वारा संयुक्त रूप से किया गया था। इसके पुख्ता प्रमाण हैं कि महात्मा गांधी की विलंबित शिरकत 9 अगस्त 1942 को हुई और वह भी बिना किसी कार्यक्रम के । अंग्रेजी राज का विरोध कैसे करना है , क्या करना है इस पर कोई कार्यक्रम नही दिया, बस एक प्रतिकात्मक नारा देकर इतिश्री कर लिया। बस प्रतीक के तौर…

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