दिन में ही लग रही भद्रा इस खातिर होलिका दहन का यह रहेगा समय

वाराणसी। होलिका दहन फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को होता है। इसका मुख्य सम्बन्ध होली के दहन से है। जिस प्रकार श्रावणी को ऋषिपूजन, विजयादशमी को देवीपूजन, दीपावली को लक्ष्मीपूजन के पीछे भोजन किया जाता है, उसी प्रकार होलिका के व्रत वाले उसकी ज्वाला देखकर भोजन करते हैं। जो इस वर्ष बुधवार 20 मार्च को पड़ रही है। होलिका दहन में भद्रा का परित्याग कर देना चाहिए। यदि कुयोगवश यदि जला दी जाय तो वहां के राज्य,नगर और मनुष्य अद्भुत उत्पादों में से एक ही वर्ष में हीन हो जाते हैं। इस साल 20 मार्च को भद्रा दिन में 9 बजकर 19 मिनट से लगकर रात्रि 8 बजकर 12 मिनट तक है, अत: रात्रि 8 बजकर 12 मिनट के बाद होलिका दहन करना लाभप्रद रहेगा।

नयी फसल अर्पित करते हंै देवताओं को

ज्योतिषाचार्य पं. गणेश प्रसाद मिश्र के मुताबिक इसी अवसर पर नवीन धान्य( जौ, गेहूं, और चना) की फसलें पककर तैयार हो रही होती है और मानव-समाज में उनके उपयोग में लेने का प्रयोजन भी उपस्थित हो जाता है। बावजूद इसके धर्मप्राण हिन्दू यज्ञेश्वर को अर्पण किये बिना नये अन्न को उपयोग में नहीं लाते, अत: होलिकादहन के दिन समिधास्वरूप उपले आदि का संचय करके उसमें यज्ञ की विधि से अग्नि का स्थापन, प्रतिष्ठा, प्रज्वालन और पूजन करके जौ, गेहूँ आदि के चरु स्वरूप बालों की आहूति और हुतशेष धान्य को घर लाकर प्रतिष्ठित करते हैं। इससे सभी प्राणी हृष्ट-पुष्ट और बलिष्ठ होते हैं। इस प्रक्रिया को वैदिक भाषा में ‘नवान्नेष्टि‘ यज्ञ कहते हैं। होली सम्मिलन, मित्रता, एवं एकता का पर्व है। इस दिन द्वेष भाव भूलकर सबसे प्रेम और भाई चारे से मिलना चाहिये। एकता, सद्भावना एवं सोल्लास का परिचय देना चाहिये। यही इस पर्व का मूल उद्देश्य है एवं संदेश है।

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