सन्तान का दाता तथा ऐश्वर्य को बढ़ाने वाला ‘बहुला चौथ’ व्रत सोमवार को, जानिये पूजन विधि

वाराणसी। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी बहुला चतुर्थी या ‘बहुला चौथ’ कहलाती है जो इस वर्ष सोमवार 19 अगस्त को पड़ रही है। इस व्रत को पुत्रवती स्त्रियां अपने पुत्रों की रक्षा के लिए करती हैं। वस्तुत: यह गो पूजा का पर्व है। सत्यवचन की मयार्दा का पर्व है। माता की भांति अपना दूध पिलाकर गौ मनुष्य की रक्षा करती है, उसी कृतज्ञता के भाव से इस व्रत को सभी को करना चाहिये। यह व्रत सन्तान का दाता तथा ऐश्वर्य को बढ़ाने वाला है। इस दिन गाय के दूध से बनी हुई कोई भी सामग्री नही खानी चाहिये और गाय के दूध पर उसके बछड़े का अधिकार समझना चाहिये। इस दिन दिनभर व्रत करके सन्ध्या के समय सवत्सा गौ की पूजा की जाती है। पुरवे(कुल्हड़) पर पपड़ी आदि रखकर भोग लगाया जाता है और पूजन के बाद उसी का भोजन किया जाता है।

यह है व्रत से जुड़ी कथा

बीएचयू ज्योतिष विभाग के शोध छात्र ज्योतिषाचार्य पं. गणेश प्रसाद मिश्र के मुताबित द्वापर युग में भगवान श्रीहरि ने श्रीकृष्ण रूप में अवतार लेकर व्रज में अनेक लीलाएं की तो अनेक देवता भी अपने-अपने अंशों से उनके गोप-ग्वाल रूपी परिकर बने। गो शिरोमणि कामधेनु भी अपने अंश से उत्पन्न हो बहुला नाम से नन्दबाबा की गोशाला में गाय बनकर उसकी शोभा बढ़ाने लगी। श्रीकृष्ण का उससे और उसका श्रीकृष्ण से सहज स्नेह था। बाल कृष्ण को देखते ही बहुला के स्तनों से दुग्धधारा फूट पड़ती और श्रीकृष्ण भी उसके मातृभाव को देख उसके स्तनों में कमलपंखड़ियों सदृश अपने ओठों को लगाकर अमृत सदृश पय का पान करते। एक बार बहुला वन में हरी-हरी घास चर रही थी। श्रीकृष्ण को लीला सूझी, उन्होने माया से सिंह का रूप धारण कर लिया, भयभीत बहुला थर-थर काँपने लगी। उसने दीनवाणी में सिंह से कहा- हे वनराज! मैने अभी अपने बछड़े को दूध नही पिलाया है, वह मेरी प्रतीक्षा कर रहा होगा। अत: मुझे जाने दो, मैं दूध पिलाकर तूम्हारे पास आ जाऊँगी, तब मुझे खा लेना। सिंह ने कहा, मृत्युपाश में फसे जीव को छोड़ देनेपर उसके पुन: वापस लौटकर आने का क्या विश्वास! निरुपाय हो बहुला ने जब सत्य और धर्म की शपथ ली, तब सिंह ने उसे छोड़ दिया। बहुला ने गोशाला में जाकर प्रतीक्षारत बछड़े को दूध पिलाया और अपने सत्य धर्म की रक्षा के लिए सिंह के पास वापस लौट आयी। उसे देखकर सिंह बने श्रीकृष्ण प्रकट हो गये और बोले बहुले! यह तेरी परीक्षा थी, तू अपने सत्य धर्म पर दृढ़ रही, अत: इसके प्रभाव से घर-घर तेरा पूजन होगा और तू गोमाता के नाम से पुकारी जायेगी। बहुला अपने घर लौट आयी और अपने वत्स के साथ आनन्द से रहने लगी।

चंद्रोदय रात 9 बजे

इस व्रत का उद्देश्य यह है कि हमें सत्यप्रतिज्ञ होना चाहिये। उपर्युक्त कथा में सत्य की महिमा कही गयी है। इस व्रत का पालन करने वाले को सत्य धर्म का अवश्य पालन करना चाहिये। साथ ही अनाथ की रक्षा करने से सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। यह भी इस व्रत कथा की महनीय शिक्षा है। चन्द्रोदय रात्रि 9 बजे है जो इसी समय व्रत का पारण होगा।

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