अयोध्या के ‘दीपोत्सव’ और ब्रज के ‘रंगोत्सव’ की तरह शुरू हुआ काशी में ‘महाशिवरात्रि महोत्सव’

वाराणसी। समूचे विश्व में धार्मिक और आध्यात्मिक नगरी काशी को देवाधिदेव महादेव के चलते विशेष सम्मान मिलता है। बावजूद इसके यहां पर शासन की तरफ से कोई आयोजन शिव को लेकर नहीं होता। पीएम मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट विश्वनाथ कारिडोर के आरम्भ होने के बाद इस साल से प्रदेश सरकार ने महाशिवरात्रि महोत्सव का आरम्भ कराया है। उत्तर प्रदेश के पर्यटन, संस्कृति, धर्मार्थ कार्य एवं प्रोटोकॉल राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डा. नीलकंठ तिवारी ने गुरुवार को गंगा के तट राजघाट पर आयोजित महाशिवरात्रि महोत्सव का दीप प्रज्वलित कर विधिवत आगाज किया। यहां 20 से 22 फरवरी तक चलने वाले तीन दिवसीय महाशिवरात्रि महोत्सव के दौरान काशी का मस्त मौला स्वरूप देखने को मिलेगा। पर्यटन मंत्री ने उम्मीद जतायी है कि महाशिवरात्रि महोत्सव काशी का अद्भुत कार्यक्रम बनेगा।

सीएम ने तत्काल दी सहमति

इस अवसर पर उन्होंने कहा कि अयोध्या में 2017 से दीपोत्सव, ब्रज में रंगोत्सव होली उत्सव का कार्यक्रम बड़े पैमाने पर होता है। इसी श्रृंखला में बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में महाशिवरात्रि के पर्व पर बड़ा एवं भव्य कार्यक्रम हो। इसके लिए प्रदेश के सीएम योगी से बात करने पर उन्होंने इसके लिए तत्काल सहमति जताते हुए कहा कि काशी में महाशिवरात्रि के पर्व पर बड़ा एवं समारोह के रूप में शिवत्व के रूप में शिवमय कार्यक्रम कराया जाए। मंत्री डॉक्टर नीलकंठ तिवारी ने कहां की काशी का मस्त मौला स्वरूप एवं काशी की सांस्कृतिक विरासत महाशिवरात्रि महोत्सव के दौरान लोगो को देखने को मिलेगी।

इन कार्यक्रमों में झूमे भक्तगण

महाशिवरात्रि महोत्सव में गुरुवार को विशेष रूप से भगवान शिव पर आधारित सांस्कृतिक कार्यक्रम संपन्न हुए। थीम सांग के रूप में गायक प्रणव सिंह गीतकार अवधेश विमल बावरा संगीत अनिल रमन, कलाकार विशाल कृष्णा द्वारा भगवान शिव पर आधारित शिव तांडव स्त्रोतम का कत्थक नृत्य, कलाकार अमलेश शुक्ला द्वारा शिव भजन का गायन, सुश्री गीतांजलि शर्मा और उनके सहयोगी कलाकारों के द्वारा ब्रज की फूलों की होली सांस्कृतिक कार्यक्रम के साथ ही अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का आयोजन विख्यात कवि सुनील जोगी के नेतृत्व में हुआ। कवि सम्मेलन में सरदार मनजीत सिंह, राजेश चेतन, अनिल चौबे, प्रख्यात मिश्रा, सुरेश अवस्थी, डा. सुमन दुबे के अलावा दमदार बनारसी एवं सांड बनारसी रहे।

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