वाराणसी। देश की सांस्कृतिक राजधानी कही जाने वाली काशी नगरी से पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का खासा लगाव था। दर्जनों बार उनका काशी आगमन हुआ था और यहां के कई राजनेताओं से उनके करीबी संबंध जीवन भर बने रहे। गंगा, घाट और मंदिरों पर पीएम बनने के पहले तक वह सहज भाव से जाते और देर तक रहते। बावजूद इसके उनका अंतिम बार काशी आगमन किसी राजनैतिक सभा या कार्यक्रम को लेकर नहीं था। मोहम्मदाबाद के भाजपा विधायक कृष्णानंद राय समेत सात लोगों की हत्या के बाद राजनाथ सिंह आरोपितों के खिलाफ कार्रवाई और मामले की सीबीआई जांच की मांग को लेकर जिला मुख्यालय पर धरने पर बैठे तो तत्कालीन सपा सरकार ने इसकी अनदेखी की। अपनी कैबिनेट के मंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ से अटल जी का खासा लगाव था। उनके धरने को समर्थन देने की खातिर अटलजी काशी आये और लंंबी लड़ाई के लिए न्याय रथ को रवाना किया।

कार्यकर्ताओं में भरा जोश

भांवरकोल (गाजीपुर) में 29 नवंवर को भाजपा विधायक की हत्या के बाद पूर्वांचल में खासा आक्रोश था। राजनाथ सिंह की छवि उस समय तक राज्यस्तरीय नेता की थी। इस मामले में तेवर दिखते हुए उन्होंने सपा सरकार के खिलाफ बिगुल फूंक दिया। अटलजी ने मामले की गंभीरता देखते हुए काशी का रूख किया और 12 दिसंबर 2005 सर्किट हाउस के सामने धरना स्थल पर पौने घंटे तक जोशीला भाषण दिया। एक तरफ सपा को खरी-खरी सुनावाई तो वहीं अपने कार्यकर्ताओं को चेताया कि आंदोलन लोकतांत्रिक तरीके से चलाना होगा तभी बात बनेगी। इस घटना के बाद राजनाथ सिंह ने मुड कर नहीं देखा और कुछ माह बाद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ही नहीं बने बल्कि राष्ट्रीय नेताओं में उनका नाम शुमार हो गया।

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