अनुप्रिया ने कायम रखी ‘हनक’, केशव मौर्या के ‘आभामंडल ’के आगे बाबू सिंह कुशवाहा की खत्म हुई ‘पकड़’

वाराणसी। लोकसभा चुनावों में पूर्वांचल का सबसे दिलचस्प मुकाबला मीरजापुर में था। यहां पर अपना दल की मुखिया और केन्द्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल का विरोध करने की खातिर उनकी मां कृष्णा पटेल और बहन पल्लवी ने घूम-घूम पर स्व. डा. सोनेलाल पटेल की दुहाई दी थी। कांग्रेस की तरफ से पूर्वांचल की कमान संभालने वाली प्रियंका वाड्रा ने अपने रोड शो में इन्हें साथ रख कर बिरादरी को मैसेज देने की कोशिश की थी। नतीजा आया तो साफ हो गया कि पटेल वोटों पर अनुप्रिया ने ‘हनक’ कायम रखी है। कुछ यही दशा कांग्रेस के दूसरे ‘सिपहसलार’ बाबू सिंह कुशवाहा की भी रही। चुनाव में उनकी पत्नी शिवकन्या समेत दूसरे प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गयी। यहां पर भी स्पष्ट हो चला है कि अब डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या की पूरी तरह से ‘पकड़’ हो गयी है।

राजनैतिक उत्तराधिकारी नहीं बन सकी मां-बेटी

दरअसल पिछली बार सांसद बनने के बाद उपचुनाव में अनुप्रिया ने अपनी खाली सीट पर मां को लड़ाया था। सूबे में सपा की सरकार थी और शासन-सत्ता के दबाव में केन्द्रीय मंत्री होने के बावजूद अनुप्रिया की एक न चली। इसके बाद परिवार का विवाद कोर्ट तक पहुमच गया। कृष्णा पटेल दूसरी बेटी पल्लवी को लेकर पति की राजनैतिक विरासत संभालने के लिए प्रयास करती रह गयी लेकिन पिछले विधानसभा और इस बार के लोकसभा चुनावों ने स्पष्ट कर दिया कि राजनैतिक उत्तराधिकारी बनने की कोशिश सफल नहीं हो सकी। दूसरी तरफ अनुप्रिया ने संगठन से लेकर सत्ता पर ध्यान दिया जिसका नतीजा रहा कि इस बार उनके कोटे में दो सीटे दी गयी लेकिन तीसरी पर उनके विधायक को भाजपा ने अपने सिंबल पर चुनाव में उतार कर सांसद बना दिया।

बाबू सिंह कुशवाहा भी कर दिये गये ‘किनारे’

कुछ यही स्थिति मौर्या-कुशवाहा वोटों पर अपने एकाधिकार का दावा करने वाले बाबू सिंह कुशवाहा के साथ भी देखा गया। पिछले लोकसभा चुनाव में उन्होंने अपनी पत्नी शिवकन्या को गाजीपुर से लड़ाया था। मोदी लहर के बावजूद शिवकन्या ने मनोज सिन्हा सरीखे दिग्गज नेता के छक्के छुड़ा दिये और कांटे के मुकाबले में हारी थी। इस दफा कांग्रेस से समझौता कर चुनावी समर में कूदने वाले बाबू सिंह ने चंदौली सरीखी सुरक्षित सीट चुनी थी जहां से पिछली बार अनिल मौर्या को ढाई लाख से अधिक वोट मिले थे। चुनाव के दौरान जुबानी दावे तो बहुंत हुए लेकिन मतगणना में स्पष्ट हुआ कि शिवकन्या की जमानत ही नहीं जब्त हुई बल्कि बिरादरी के वोटों में बाबूसिंह की पकड़ खत्म हो चली है। कमोवेश दूसरे प्रत्याशी भी पांच अंक में वोट के लिए तरस गये।

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