लखनऊ। साल भर पहले तक प्रदेश की सत्ता में काबिज समाजवादी पार्टी छोटे दलों को घास नहीं डालती थी। पार्टी को खुद पर इतना भरोसा था कि कांग्रेस से गठबंधन अपनी शर्तो पर किया था। दशा यह थी कि समझौते में सीट भले दे दी हो लेकिन प्रत्याशी अपना खड़ा किया था। चुनाव में मिली करारी मात के बाद सपा की कमान संभाल रहे अखिलेश यादव ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है। जिन दलों को एक-दो जिलों में प्रभाव हो या अपनी जाति का छोटा वोट बैंक प्रभावित करते हों उन्हें भी अखिलेश की तरफ से पूरा भाव मिल रहा है। भाजपा ने भासपा और अपना दल के साथ जो गठबंधन किया था उसे अब सपा भी अपना रही है। ताजा मामला गोरखपुर का है जहां लोकसभा उपचुनाव के लिए समाजवादी पार्टी ने इंजीनियर प्रवीण निषाद को प्रत्याशी घोषित किया है।

सपा के सदस्य तक नहीं हैं प्रवीण

समाजवादी पार्टी ने जिस प्रवीण निषाद को गोरखपुर सीट पर उम्मीदवार बनाया है वह चुनाव भले साइकिल के निशान पर लड़े लेकिन वह पार्टी के सदस्य तक नहीं हैं। उनकी पहचान निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. संजय निषाद के बेटे के रूप में रही है। संजय निषाद खुद अपनी बिरादरी के बड़े नेता माने जाते हैं। विधानसभा चुनाव में काफी प्रयास के बावजूद उन्हें किसी दल ने भाव नहीं दिया जिस पर खुद उपने प्रत्याशी खड़े किये थे। बताया जाता है कि सपा के पास कोई दमदार प्रत्याशी नहीं था जिसके चलते उसे आयातित उम्मीद्वार पर दांव लगाना पड़ा।

दूसरे दलों को भी ले रहे पाले में

लोकसभा उपचुनाव की घोषणा से पहले ही अखिलेश अपने नये एजेंडे पर चलने लगे थे। सम्भवत: यही कारण था कि पिछले दिनों जनवादी पार्टी के कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में हिस्सा लिया। इसके कर्ताधर्ता संजय चौहान मूल रूप से गाजीपुर के निवासी हैं और बिरादरी के वोटों पर पकड़ रखते हैं। यही नहीं पीस पार्टी को गठबंधन में शामिल कर अखिलेश ने मास्टर स्ट्रोक चला है। तराई इलाके में इस पार्टी का आधार है और पहले भी विधानसभा चुनाव में पीस पार्टी अप्रत्याशित परिणाम दे चुकी है।

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