‘गठबंधन’ को लेकर मिल रही रिपोर्ट के चलते अखिलेश उतरे मैदान में! पहले किया स्टार प्रचारकों से मुलायम का पत्ता ‘साफ’ बाद में जोड़ा

लखनऊ। सपा-बसपा का गठबंधन हुए कई माह हो चुके हैं। दोनों दलों के बीच सीटों का बंटवारा ही नहीं बल्कि अपने कोटे के प्रत्याशियों की घोषणा भी की गयी है। बावजूद इसके दोनों ही दलों के कार्यकर्ता एकजुट नहीं हो पा रहे हैं। पश्चिम उत्तर प्रदेश से दोनों नेता के होने के चलते कुछ मान-मनौव्वल भी हो सका लेकिन पूर्वांचल की स्थिति सुधरने का नाम नहीं ले रही है। यहां वैसे भी बूथ पर मोर्चा यादव संभालता है दलित नहीं। इस आशय की रिपोर्ट मिलने के बाद सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने खुद आजमगढ़ से चुनाव मैदान में उतरने का मन बनाया। माना जा रहा है कि इसके जरिये वह आसपास की सीटों पर भी प्रभाव रख सकेंगे और दोनों दलों के कार्यकर्ताओं को लामबंद करने का कोई दूसरा उपाय भी नहीं हो सकता था।

पुरनियों के लिए अब भी मुलायम का नाम

सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव को पश्चिम की तरह पूर्वांचल से जैसा समर्थन मिलता था वैसा अखिलेश के साथ नहीं है। मुख्यमंत्री के रूप में वह पूर्वांचल को साध नहीं पाये थे। अलबत्ता अधेड़ से बुजुर्गों में अब भी मुलायम का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है और उन्हें ऐसे नेता माना जाता है जो अपने कार्यकर्ताओं के लिए किसी हद तक जा सकता था। पिछले विधानसभा चुनाव में भी मुलायम परिवार के इलावा कहीं प्रचार के लिए पहुंचे थे तो वह जौनपुर था। पहली सूची में मुलायम को स्टार प्रचारकों की सूची से आउट कर उनको अब मैनपुरी तक सीमित कर दिया गया था। इसका भी नुकसान हो सकता था जिसे भांप कर न सिर्फ स्टार प्रचारकों की सूची में शामिल किया बल्कि इसका फौरन ही जारी करा दिया। वैसे अखिलेश सुरक्षित मान कर ही आजमगढ़ से मैदान में उतरे हैं क्योंकि इस सीट से अब तक मुलायम ही सांसद थे।

कई सीटों पर है खासी नाराजगी

गाजीपुर,जौनपुर,भदोही,मछलीशहर समेत पूर्वांचल की अधिकांश सीटों पर सपा खासी मजबूत थी। विधानसभा चुनाव में मिले वोट इसका उदाहरण भी हैं। बावजूद इसके इन सीटों को बसपा को दे दिया गया। मुलायम की तर्ज पर पार्टी की स्थापना से जुड़े नेता मानते हैं कि गठबंधन का पूरा लाभ मायावती ने उठा लिया और राजनैतिक अनुभव की कमी के चलते कमजोर सीटों पर सपा को संतोष करना पड़ा। जो शहरी सीटें मिली हैं वहां बसपा का वोट बैंक नहीं है लिहाजा अपने बूते चुनाव लड़ना पड़ेगा। इस असंतोष को दूर करने के लिए भी अखिलेश खुद मैदान में आये हैं।

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