#हिन्दी_साहित्य के शलाका पुरुष डाॅ. नामवर सिंह नहीं रहे !! **********

डाॅ. नामवर सिंह हिंदी साहित्य के सूक्ष्मदर्शी, पहले आधुनिक प्रगतिशील आलोचक थे. पिछले कई महीने से उनकी अस्वस्थता की खबरें लगातार आ रही थीं. 19 फरवरी को रात 11.50 पर उन्होंने दिल्ली में अंतिम सांस ली. नामवर सिंह की उपस्थिति ही हिंदी आलोचना की चमक का जो लौ देती थी वह अब बुझ गई. उनकी उम्र 92 वर्ष थी.

नामवर जी के कामों ने हिंदी आलोचना को कुछ ऐसे नये आयाम प्रदान किये थे, जिनसे परंपरा की बेड़ियों से मुक्त होकर आलोचना को नये पर मिले थे. पिछली सदी में ‘80 के दशक तक के अपने लेखन में आलोचना के सत्य को उन्होंने उसकी पुरातनपंथ की गहरी नींद में पड़ रही खलल के वक्त की दरारों में से निकाल कर प्रकाशित किया था.

उन्हें हिंदी साहित्य के इतिहास में सदा याद किया जायेगा. उनके भाषणों में एक जादुई आकर्षण था. काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में उनके कई महत्वपूर्ण व्याख्यान की रिपोर्टिंग करने का मुझे अवसर मिला था. उनसे जुड़ीं अनेक स्मृतियां हैं, जिस पर कभी और लिखेंगे. पिछले कुछ सालों से उनकी रचनात्मक गतिविधियां कम हो गई थीं और वे एक प्रकार से मैदान से हट चुके थे.

नामवर जी की तमाम स्मृतियों के प्रति अश्रुपूर्ण आंतरिक श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए हम उन्हें विदा करते हैं. यह हिंदी साहित्य के जगत के लिये एक गहरे शोक की घड़ी है.

साभार : वरिष्ठ पत्रकार सुरेश प्रताप सिंह की फेसबुक वाल से

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