वाराणसी से लगभग 200 किलोमीटर दूर संत कबीरनगर में छोटा सा कस्बा है मगहर ! काशी को मोक्षदायिनी नगरी कहते हैं. सवाल यह है कि आखिर काशी को छोड़कर अंतिम समय में कबीर मगहर क्यों गए ?

16वीं सदी में महान संत कबीर वाराणसी में पैदा हुए. और 500 वर्ष पूर्व 1518 में उनकी मृत्यु मगहर में हुई. मगहर में कबीर की समाधि भी है और मजार भी ! कहते हैं कि कबीर के पार्थिव शरीर को लेकर हिन्दुओं और मुसलमानों में संघर्ष भी हुआ था !!

जनश्रुतियों के अनुसार मगहर में मरने से अगले जन्म में आदमी गधा होता है या नरक में जाता है. जबकि काशी में मरने पर मोक्ष मिलता है. तब बनारस पौराणिक पंडितों का गढ़ था. और वो काशी की महिमा का बखान बढ़ा-चढ़ाकर करते थे. और इसी पोंगापंथी सोच का विरोध करने के लिए कबीर ने अंतिम समय में मगहर जाने का फैसला किया !!

कहते हैं कि बौद्ध भिक्षु इसी मार्ग से कपिलवस्तु, लुंबिनी, कुशीनगर आदि बौद् स्थलों के दर्शन के लिए जाते थे. तब रास्ते में उन्हें स्थानीय लोग लूट लेते थे. जिसके कारण इसका नाम “मार्गहर” पड़ गया, जो बाद में बोलचाल में मगहर हो गया.

नरेन्द्र मोदी पहले प्रधानमंत्री हैं, जो मगहर गए हैं. इससे पहले इंदिरा गांधी पूर्व प्रधानमंत्री के तौर पर वहां गई थीं. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल के अंतिम वर्ष में उनके मगहर जाने को लेकर राजनीतिक क्षेत्र में विभिन्न प्रकार की चर्चाएं व्याप्त हैं. जबकि कबीर की जन्म व कर्मस्थली काशी है और नरेन्द्र मोदी यहां के सांसद हैं. कबीर मठ (कबीरचौरा) के महंत आचार्य विवेक दास ने भी मोदी के मगहर जाने की आलोचना की है. विवेक दास का कहना है कि कबीर जयंती के अवसर पर बनारस में कार्यक्रम आयोजित किया जाना चाहिए था.

वैसे बनारस में कबीर प्राकट्योत्सव पर तीन दिवसीय कार्यक्रम आयोजित किया गया और उत्सवी माहौल में मना. शोभायात्रा भी निकाली गई ! आचार्य विवेक दास के मुताबिक संत कबीर के विचारों को आत्मसात करने की जरूरत है. तभी समाज में व्याप्त असमानता व अस्थिरता दूर होगी.
साभार – वरिष्ठ पत्रकार सुरेश प्रताप सिंह के फेसबुक वाल से…

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